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अगर सऊदी अरब 9/11 हमले के पीड़ितों के लिए ज़िम्मेदार हैं तो अमेरिकी इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के पीड़ितों के लिए ज़िम्मेदार क्यों नहीं ?

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ हैं जब राष्ट्रपति के वीटो को कांग्रेस द्वारा रद्द किया गया हो. बीते बुधवार को अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति के उस बिल के वीटो को ओवरराइड करने के लिए एक तरफ़ा मतदान किया जिसके मुताबिक 9/11 आतंकी हमले के पीड़ितों के परिजन अब सऊदी के खिलाफ मुक़दमा दायर कर सकेंगे.

यहाँ तक की डेमोक्रेट्स पार्टी के सांसद ने भी बड़ी संख्या में अपने स्वयं राष्ट्रपति के वीटो को रद्द करने के लिए मतदान किया. एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अदालत अमेरिकियों द्वारा प्राप्त की गयी सभी संपंत्ति को ज़ब्त कर लेगा. इस वीटो के रद्द होने के बाद सऊदी अरब भी खतरे का मुक़ाबला करने के लिए योजना बना रहा हैं.

इस वीटो के रद्द होने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं, यदि अमेरिकी प्रशासन पूरी तरह से इस हमले में शामिल आरोपियों के बारे में अनजान थे,

तो कैसे हमले होने के दस मिनट के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति जोर्जे बुश ने इस हमले के लिए ओसामा बिन-लादेन के नेतृत्व वाले आतंकी संगठन अल-क़ायदा को ज़िम्मेदार ठहराया था?

क्यों किसी भी आयोग ने इस मामले की जांच रिपोर्ट औपचारिक तौर पर प्रस्तुत नही की गयी?
क्यों ओसामा बिन-लादेन को मारा गया बजाय अदालत में मांग करने के?

और हां निश्चित रूप से सबसे बड़ा सवाल यह उठता हैं, यदि 9/11 हमले के पीड़ित सऊदी अरब की सरकार से प्रतिकार की मांग कर रहे हैं या उन पर मुक़दमा दायर करने की मांग कर रहे हैं, तो अमेरिकी युद्ध में मारे गए इराकी और अफ़गानी अदालत में अमेरिका के खिलाफ मुक़दमा दायर करने और प्रतिकार कर की मांग क्यों नहीं कर सकते?

जबकि सऊदी अरब सर्कार ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपो को ख़ारिज कर दिया हैं और कहा हैं कि 9/11 हमले में सऊदी सरकार किसी भी रूप से शामिल नहीं थी. ज़ाहिर हैं कि मुस्लिम देशो में इतनीं क्षमता नहीं हैं कि वह अमेरिका के खिलाफ अदालत में मुक़दमा चलाये.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी विशेषज्ञओ ने अदालत में मुक़दमा होने का दर व्यक्त किया हैं.

लेकिन अमेरिकी हमेशा अपनी ही ज़िन्दगी के बारे में सोचते हैं उनको दूसरो की ज़िन्दगी की चिंता नहीं हैं सच कहिये तो वह स्वार्थी हैं. अमेरिकी द्वारा बम धमाके मारे गए पीड़ितों के बारे में कोई नहीं सोचता.

Note-यह लेख इंग्लिश में प्रकाशित किया गया था जिसके मूल लेखक दिल्ली के जावेद जमील हैं बाद में लेख के कुछ अंशों को हिंदी में रूपांतरित किया गया