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खाड़ी देशों में काम पाने के बदले भारी-भरकम भुगतान करने को मजबूर हैं एशियाई प्रवासी

एक जांच के अनुसार, खाड़ी देशों में जहाँ निर्माण कार्यों में तेज़ी आ रही है, वहीँ साउथ एशियाई प्रवासी अपनी नौकरी के लिए गैरकानूनी रूप से भुगतान करने को मजबूर हैं. उन्हें ख़राब कामकाजी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है.

अमेरिकी शोधकर्ताओं ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि हर साल लाखों प्रवासी अपनी गरीबी मिटाने के लिए क़तर से लेकर यूएइ तक में काम मिलने की एवज में नकदी का भुगतान करने को मजबूर हैं. ये भुगतान उनके एक साल के वेतन के बराबर तक हो सकता है. न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय के स्टर्न सेंटर फॉर बिज़नेस एंड ह्यूमन राइट्स के डेविड सेगल ने कहा, ये भर्ती नि: शुल्क नहीं है, किसी को इन लागतों को सहन करना पड़ता है, लेकिन यह निश्चित रूप से नियोक्ता कंपनी को होना चाहिए.

इस जांच के दायरे में भारत, नेपाल और बांग्लादेश के वे श्रमिक आते हैं जो 2022 में होने वाले फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की मेजबानी कर रहे क़तर में काम कर रहे हैं. ये प्रवासी मजदूर गंदगी में रहने पर मजबूर हैं और भोजन-पानी-आश्रय की उचित व्यवस्था के बिना काम करने को मजबूर हैं.

इस शोध में बताया गया कि एशियाई प्रवासियों को वहां मुश्किल परिस्थितियों में तो काम करना पड़ता ही है, उन्हें भारी भरकम भुगतान भी देना पड़ता है. नियमों के ऐसे उल्लंघन के मामले में कभी-कभार ही कोई कारवाई की जाती है.

अध्ययन के अनुसार, खाड़ी देशों में तकरीबन 10 मिलियन की तादाद में काम करने वाले एशियाई श्रमिकों में से बांग्लादेशी श्रमिकों ने 5,200 डॉलर तक का भुगतान किया. इस अध्ययन में ये भी पाया गया कि निर्माण कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए भी खर्च करती हैं.

निराश्रित प्रवासियों को इस भुगतान की उच्च ब्याज दर के मकडजाल में उलझा लिया गया. ये वो लोग हैं जो पहले से ही हताश हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें अपने परिवार को गरीबी की स्थिति से निकालने के लिए उनसे दूर रहकर भी काम करना पड़े तो करना चाहिए.

प्रवासी घरेलू श्रमिकों के खिलाफ दुरुपयोग की रिपोर्ट ने हाल ही के वर्षों में मध्य पूर्व में नौकरियों की मांग के कारण केन्या, इथियोपिया, यूगांडा और इंडोनेशिया जैसे देशों को अपने नागरिकों पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रेरित किया है.
न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की रिपोर्ट कतर में किए गए एक जांच के निष्कर्षों पर फैली हुई है और पिछले हफ्ते जारी की गई, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि सैकड़ों एशियाई श्रमिकों ने भर्ती शुल्क का भुगतान किया.