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‘पुरुष-प्रधान’ सऊदी अरब ने एक ही हफ्ते में इन तीन बड़े पदों पर की महिलाओं की नियुक्ति

‘पुरुष-प्रधान’ समाज वाले सऊदी अरब में वित्तीय क्षेत्र में एक ही हफ्ते में तीन महिलाओं को नौकरी पर नियुक्त किया गया है जो उद्योग और समाज, दोनों ही के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है. सारा-अल-सुहैमी सऊदी अरब के शेयर बाज़ार की चेयरपर्सन हैं तो रानिया नसार साम्बा फाइनेंसियल ग्रुप की सीईओ बनायी गयी हैं, वहीँ लातीफा-अल-सभन को अरब नेशनल बैंक का चीफ फाइनेंसियल ऑफिसर नियुक्त किया गया है.

तदावुल ने गुरुवार को ये घोषणा की कि खालिद-अल-रबिअह की जगह अब अल-सुहैमी मध्य पूर्व के सबसे बड़े बाज़ार की अध्यक्षता करेंगी. वो उम्मीद करती हैं कि नेशनल कॉरपोरल बैंक (एनसीबी) कैपिटल में निवेश-बैंकिंग यूनिट के सीईओ के रूप में भी बनी रहेंगी.

 आधिकारिक वेबसाइट पर एक बयान के मुताबिक, अल-सुहिमी के नेतृत्व में, एनसीबी कैपिटल में दस लाख से ज्यादा ग्राहक हैं और एसआर77 अरब (20.5 अरब डॉलर) की परिसंपत्तियां प्रबंधन के अधीन हैं, जिसने इसे राज्य का सबसे बड़ा परिसंपत्ति प्रबंधक बनाया है.

तदावुल के कदम पर चलते हुए साम्बा फाइनेंसियल ग्रुप ने 20 वर्ष के अनुभव वाली रानिया नसार को अपना सीईओ नियुक्त किया. यह कदम 22% से 30% तक कर्मचारियों की संख्या में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए सऊदी विजन 2030 सुधार योजना में उल्लिखित लक्ष्य के अनुरूप है.

एक सऊदी सामाजिक कार्यकर्ता और नेशनल सोसाइटी फॉर ह्यूमन राइट्स के वरिष्ठ सदस्य सुहाला जैन अल-अबीदीन ने कहा कि यह एक अच्छी पहल है. सऊदी महिलाएं इससे कहीं अधिक पाने की योग्यता रखती हैं. इससे दुसरे क्षेत्रों में महिलाओं को आगे बढ़ते देखने के और अवसर मिलेंगे.

कतर विश्वविद्यालय के सऊदी लेखक और विजिटिंग प्रोफेसर हट्टन-अल-फसी ने भी नियुक्तियों की प्रशंसा की और कहा कि यह एक कदम आगे बढ़ने जैसा है. “इससे पता चलता है कि देश (सरकार) महिला प्रमुख पदों की पेशकश करने में गंभीर है और इससे पता चलता है कि जब सरकार कुछ चाहती है और वादे करती है तो यह बदलाव वास्तविकता के लिए तुरंत आता है.

सऊदी अरब में महिलाओं में आशावाद की बड़ी लहर के बावजूद अभी उनके कामकाजी होने में बहुत सी चुनौतियाँ और बाधाएं मौजूद हैं. अल-फसी और अल-अबदीन दोनों का मानना ​​है कि महिलाओं के बेहतर सशक्तीकरण के लिए काम करने के लिए कई नियमों में परिवर्तन की आवश्यकता है.

अल-फस्सी ने कहा कि वह उन नियमों में भी तेजी से परिवर्तन देखने की प्रतीक्षा कर रही हैं जो महिलाओं के दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं. सशक्तिकरण का मुख्य मुद्दा यह है कि अभी भी ऐसे नियम हैं जो महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण जीवन निर्णय करने देने में असमर्थ हैं. उन्होंने कहा कि महिलाएं इतने बड़े पदों तक तो पहुँच गयी हैं लेकिन अभी भी खुद यात्रा करने, कहीं अकेले आने-जाने में अक्षम हैं. ये बात ध्यान देने योग्य है कि अभिभावकों और और पुरुषों को केवल नाबालिगों और अक्षमों पर ही ध्यान देने की ज़रूरत है. जो महिलाएं सक्षम हैं उन्हें ड्राइविंग जैसे काम भी खुद ही करने दिए जाएँ.