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अपना पेट काट कर बेटी की ख़ुशी के लिए पैसे जोड़ता रहा ये अपाहिज मुस्लिम भिखारी

माँ-बाप किसी भी इंसान की ज़िन्दगी में वो शख्स होते हैं जो औलाद की ख़ुशी और भले के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और कितनी भी तकलीफों से गुज़र कर भी अपने बच्चों की ख्वाहिशें पूरी करते हैं. जिद करते हुए बच्चे ये नहीं सोचते कि उनके माँ-बाप पर क्या गुजरेगी, वो उनकी जिद पूरी कर भी पाएंगे या नहीं. और बहुत बार ये तब समझ आता है जब अपना बच्चे की जिद के आगे अपनी जिद याद आती है. फिर भी हर माँ-बाप अपने बच्चों की खुशियों में कोई कसर नहीं छोड़ते, वो केवल पैदाइश-परवरिश ही नहीं करते, औलाद के लिए बेशुमार प्यार के चलते कई बार कुछ ऐसा कर जाते हैं जो अपने आप में मिसाल कायम कर देता है.

ऐसे ही एक शख्स की है ये कहानी. एक दुर्घटना में अपना दायाँ हाथ खो चुके कव्सर हुसैन अपनी बच्ची की ख़ुशी की खातिर 2 साल से पैसे जोड़ रहे थे. हालाँकि बच्चों की ख्वाहिश पूरी करने के लिए अमूमन हर पिता पैसे जोड़ते हैं. पर ये पिता कुछ अलग हैं. ये सिर्फ विकलांग ही नहीं हैं. दुर्घटना में एक हाथ खो देने की वजह से उन्हें कही कोई नौकरी कही कोई काम नहीं मिला. हालात यहाँ तक आ गए कि उन्होंने भीख माँगना शुरू कर दिया.

2 साल से अपनी बेटी को कुछ भी न दे पाने का गम उन्हें खाए जा रहा था. अपनी बच्ची को नए कपड़ों में देखने की चाह में उन्होंने रोज़ पैसा जोड़ने का फैसला किया. वो हर रोज़ अपना तन-पेट काट कर कुछ पैसे बचाते. लेकिन पैसो की दुनिया में किसी गरीब को खुशियाँ मिलना आसान नहीं होता.

हुसैन ने बताया कि इन 2 सालों में उन्होंने 5-5 के नोट ही जोड़े थे. जिनकी संख्या तकरीबन 60 थी. यानि वो 2 साल में 300 रुपये के आस-पास ही जोड़ पाए थे. फिर एक दिन वो अपनी बेटी को नए कपडे दिलाने बाज़ार गए. जब उन्होंने दुकानदार के सामने अपनी 2 साल की जमा पूँजी रखी तो दुकानदार झल्ला कर उन्हें दुत्कारते हुए बोला,”भिखारी हो क्या?” इससे उनकी बेटी की आँखें भर आयीं और वो अपने पिता का हाथ पकड़ कर दुकान से जाने लगी. इस पर हुसैन ने अपनी बेटी को रोका और दूकानदार से विनम्रता से कहा कि हाँ मैं भिखारी हूँ.

हुसैन ने बताया कि नए कपड़ों में उनकी बेटी बहुत खुश थी. इसलिए जिस ख़ुशी की खातिर हुसैन ने 2 साल तक पाई-पाई जोड़ी, उस ख़ुशी को देखने के लिए उन्होंने उस दिन काम से छुट्टी ली. उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि इस एक दिन की छुट्टी से वो कुछ कमा नहीं पाएंगे लेकिन बेटी की ख़ुशी, उसके साथ बिताये पल पैसों से बड़े हैं.

हुसैन की इस कहानी से ये तो साबित होता है कि माता-पिता चाहे गरीब ही क्यों न हो, वो अपने बच्चों की खुशियों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.