Home एशिया अमेरिका और चीन के बीच पिस रहा कोरिया

अमेरिका और चीन के बीच पिस रहा कोरिया

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार चीन के राष्ट्रपति शी जेन पेंग और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की फ्लोरिडा में बैठक के बाद कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव ध्यान देने योग्य है।

अगरचे चीन ने इस यात्रा के तुरंत बाद उत्तर कोरिया के परमाणु मामले में अपने मुख्य वार्ताकार को दक्षिण कोरिया रवाना किया ताकि यह दिखा सके कि वह ट्रम्प से किए गए वादे के अनुसार कोरियन प्रायद्वीप के परमाणु संकट को हल करने के लिए तैयार है।

लेकिन इसी के साथ ही विश्लेषकों के अनुसार अमरीकी युद्ध पोतो का उत्तरी कोरिया के पानी में भेजा जाना बीजिंग और वाशिंगटन के बीच उत्तरीय कोरिया के परमाणु मामले पर किसी भी प्रकार के समझौते की क़ीमत को बढ़ा रहा है।

जिसके मुक़ाबले में उत्तर कोरिया ने भी जिसके बारे में कहा जाता है कि उसका परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम चीन के साथ किया जाता है वह परमाणु युद्ध की बात करके चीन के साथ होने वाले किसी भी मामले में अमरीका के ख़र्चों को बढ़ा रहा है।

इसीलिए कहा जा रहा है कि ट्रम्प ने चीनी राष्ट्रपति से वादा किया है कि अगर चीन उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के संकट में सहयोग करेगा तो वह चीन के साथ व्यापार में अमरीका के व्यापार घाटे को अनदेखा कर देंगे।

क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प चीन पर जो आरोप लगातार लगाते रहते हैं वह करंसी के रेट में हस्तक्षेप और डम्पिंग के माध्यम से अमरीका के साथ होने वाले मामलों में धोखे धड़ी करना है, ट्रम्प ने इसकी छानबीन करने का आदेश दिया है जिस पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दिखाई है।

इसलिए ऐसा लगता है कि चीन और स्वंय ट्रम्प की व्यापारिक मानसिकता को देखते हुए दोनों पक्ष कोई ऐसा मामला करना चाहते हैं जिसमें दोनों पक्षों की जीत हो।

अगरचे चीन के साथ ट्रम्म द्वारा व्यापारिक नुक़सान को बर्दाश्त करना राष्ट्रीय स्तर पर उनकी आलोचना और निदा का कारण बने लेकिन ट्रम्प को लगता है कि अगर वह उत्तर कोरिया को परमाणु कार्यक्रम और मीज़ाइल प्रोग्राम को रोकने में सफ़ल हो गए तो राजनीतिक स्तर पर क्षेत्र में यह उनकी बड़ी कामयाबी होगी।

उत्तर कोरिया के साथ समझौता कराने के बदले में चीन भी ट्रम्प के साथ बड़ा सौदा करना चाहता है और वह अमरीकी बाज़ार में चीन को पहुँच और चीन की अर्थव्यवस्था की तरक़्क़ी की गारंटी चाहता है।

अमरीकी राष्ट्रपति की यह धमकी कि अगर चीन उत्तर कोरिया के परमाणु और मीज़ाइल कार्यक्रम को रोकने में सफल न हुआ तो अमरीकी उत्तर कोरिया के विरुद्ध एकतरफ़ा कार्यवाई करेगा, एक प्रकार से चीन द्वारा सहयोग न करने की स्थिति में बड़ी क़ीमत का चुकाया जाना है।

पश्चिमी पुक्षों का यह कहना कि अमरीका और उत्तर कोरिया के संबंध इतने गंभीर नहीं थे यह इस बात को बयान करता है कि चीन ने कोरिया संकट को अमरीकी दबाव के बचने में सफ़लता पूर्वक प्रयोग किया है और इस मामले में ट्रम्प का सौदे के लिए तैयार होना दिखाता है की बीजिग कम से कम ख़र्च में ट्रम्प की उग्र राजनीतिक को कंट्रोल करने की अपनी सियासत में कामयाब रहा है और उनको एक बड़े व्यापारिक सौदे पर मजबूर कर दिया है जो कि चीन के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चीन और अमरीका के सौदे के बीच उत्तर कोरिया क्या मिला होगा, जो अपनी आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा कर अमरीका के सामने खड़ा है।