Home स्पेशल रिपोर्ट रमज़ान: पहले रोज़े की कहानी…

रमज़ान: पहले रोज़े की कहानी…

इस्लाम धर्म में रोज़े की क्या अहमियत है यह हर एक मुस्लमान अच्छी तरह समझता हैं. ऐसा ही एक वाक्या सामने आता है जहां पर एक सात साल कि बच्ची ने रोज़ा रख कर इस बात को साबित कर दिया कि अल्लाह अपने जिस बन्दे से जो चाहे वह काम करा ले. इस वक़्त यह बच्ची बहुत बड़ी हो गयी है. और स्कूल में लेक्चरर हैं.

आइये उनकी ज़ुबानी सुनते है उनके पहले रोज़े की दास्ताँ –
अपना पहला रोज़ा याद करते हुए कॉमर्स की लेक्चरर निमरा सलीम ने बताया कि, रमज़ान का ज़िक्र शुरू होते ही मुझे मेरा पहला रोज़ा याद आ जाता है, जब मैं सात साल की थी, तब मैंने पहली बार रोज़ा रखा था. अम्मी अब्बू नहीं चाहते थे कि मैं रोज़ा रखु, पर मैंने उनकी एक भी ना सुनी और रोज़ा रख लिया.

जिसके बाद मुझे खूब तोहफे मिले. सऊदी अरब में रहने वाले मेरे भाई ने मेरे लिए तोहफे में कपड़े भिजवाए. जिसके साथ एक नसीहत भरा खत भी भेजा. बल्कि मैं तो बयान भी नहीं कर सकती कि इतने सारे तोहफे पाकर मैं कितनी खुश थी.

जिस दिन मैंने रोज़ा रखा उस दिन इत्तिफ़ाक़ से किसी का इंतिक़ाल हो गया, जिसके बाद मेरे अब्बू-अम्मी वह चले गए. भूक-प्यास का आलम था लेकिन मैंने भी ठान लिया था के मैं रोज़ा पूरा करुँगी. देखते-देखते रोज़े का वक़्त करीब आ गया और अब्बू-अम्मी भी लौट ए जिसके बाद मेरी रोज़े खुशी हुई आस-पड़ोस के लोग हमारे घर आये और हमको ढेर सारे तोहफे भी मिले. ऐसा था मेरा पहला रोज़ा.

Web-Title: Ramadan: the story of first Fast

Key-Words: Ramadan, first, fast, story